क्या हम अपने माता-पिता की संतान हैं
यदि हां, तो.....
उनके जीवन की सहजता का विस्तार
हम तक क्यों नहीं
उनके पलों के सुकून की छाया
हम पर क्यों नहीं
पर शायद ऐसा नहीं है
यह कुछ वैसा है
जैसा खलिल जिब्रान ने कहा था......
हर शिशु है परिणाम..
जीवन के स्वयं के प्रति चाहत की
वह जीवन, जो समय के गर्भ में पलता है
वह जीवन, जो समय की परछाइयां ढ़ोता है
हम समय के जटिलताओं की संतान हैं
हम विरोधाभासों के परिणाम हैं
हम विडंबनाओं की कहानी हैं
विडंबना यह कि
जटिलताओं में भी हमें सरल रहना है
विडंबना यह कि
विरोधाभासों में भी हमें अडिग रहना है
विडंबना यह कि
जीवन अगर एक नदी है
तो हमें तैरना है, पर धारा के विपरीत
शायद यही सच है हमारा
यही सच है मेरा
यही सच है तुम्हारा
शायद यह सच इसलिए भी है कि
हममें साहस है इस सच के सामना का
और जब साहस है तो उदासी किस बात की.....!
No comments:
Post a Comment