Monday, January 5, 2015

मुझे उड़ने दो..।

बंधन में मत बाँधो...
मुझे उड़ने दो।।
तुम्हारा बंधन बहुत ही प्यारा है
मेरी भी आँखों का तारा है
पर मेरा जीवन पथ है कुछ और
उसमे रमने दो।।
बंधन में मत बाधो, मुझे उड़ने दो।।
किसी टहनी पर बसेरा था
उम्मीदों का घेरा था
उसके आने की आस थी
हर आहाट में बसी साँस थी
पर जो निकला वो आंधी था
तिनकों को बिखेर गया, बिनने दो।।
बंधन में मत बाँधो, मुझे उड़ने दो।।
मेरे अंदर कुछ चटक गया है
अपने वजूद का कोई टुकड़ा छिटक गया है
कुछ अपना सा बिछड़ गया है
मेरा स्व अब अधूरा लगता है
उस आधे को ढूंढ़ने दो।।
बंधन में मत बंधो, मुझे उड़ने दो।।
एक मुट्ठी जमीन थी, एक मुट्ठी था आसमान
यही था मेरा वितान
बस इस पात से उस पात डेरा था
पर तक़दीर की रेखाओं के लिए
तंग यह घेरा था
बहुत कुछ अनदेखा बुला रहा है
इन्द्रियों से भी परे कोई रहस्य, रीझा रहा है
इस अज्ञात के आकर्षण को, आलिंगन में भरने दो।।
बंधन में मत बांधो, मुझे उड़ने दो।।
कौन जाने कोई पूर्णता वहां, टकटकी लगाये हो
मेरे वजूद का टुकड़ा, उसकी पैरहन ओढ़े बैठा हो
कौन जाने वो वहीँ को हो निकल पड़ा
मत रोको , मुझे उस राह को चलने दो
जो है शायद, जीवन पथ मेरा।।
बंधन में मत बांधो, मुझे उड़ने दो।।
माना कि वो बंधन बहुत ही प्यारा है
मेरी भी आँखों का तारा है
पर मेरा जीवन पथ है कुछ और
उसमेँ रमने दो।।
बंधन में मत बांधो, मुझे उड़ने दो।।

जी लेने दो...

जी लेने दो दोस्त,
उसे जी लेने दो
दुनिया की प्याली में
जिन्दगी का जाम
पी लेने दो.....।
खट्टी-मीठी,  नमकीन
हर स्वाद से लबरेज़
जिंदगी, जी लेने दो....।
कल जब
किसी मोड़ पर टकराये तो
उसकी आँखों में
शिकायतों का पुलिंदा न हो....
कि मेरी मखमली पैरहन तले
वह अछूता रहा
किसी पागल बसंती बयार से
मौसम की करवटों से
सर्द हवाओं से
गर्म थपेड़ों से....।
उसकी आँखों में
मुझे भेदते प्रश्न न हो....
कि क्यों खो जाने दिया मैंने
मेरे सदाबहार में
उसके हिस्से की हरियाली
और बंजर
उसके रास्ते का समतल
और ढ़लान....।
इसलिए उसे जी लेने दो,
जी भर के
जिंदगी के हर आडम्बर
और चकाचोंध को पी लेने दो,
जी भर के.....।
कल जब
वो मुझसे मिले
तो उसकी आँखों में
न शिकायते हों, न सवाल
न झूठ का पर्दा हो
न कुछ छूट जाने की कसक
बस हों मैं और वो...।
वो तब बस मुझसे मिले
मिले उस किताब से
जिसके पन्नों को उसने
पलटा था बेतरतीब
पढ़ने की ख्वाहिश जता
वो बढ़ गया आगे
और पन्ने फड़फड़ातेे रहे....
अब वो जब भी मिले
उसकी हाथों में
बस वही एक किताब हो....
तब तक दोस्त
जी लेने दो उसे....।
तुम पूछोगे कि
कब तय है मिलने का वो पल
नहीं जानती मैं
पर कहते हैं कि
निर्णय का दिन नियत है
जब नंगी सच्चाईयां
खड़ी होती हैं आमने-सामने।।।।।

जो द्वार तुम खोल गए


जो द्वार तुम खोल गए
उसका मैं क्या करूँ
जिन हिमखंडों को तुम तपिश दे गए
उनका मैं क्या करूँ.....

हड्डियों को गलाती
कभी बर्फीली हवाएँ अंदर आती हैं
तो कभी लू के थपेड़े
झुलसा जाती हैं....
अंतस के किसी भी कोने में
न गर्माहट है, न शीतलता
मैं क्या करूँ????
जो द्वार तुम खोल गए
उसका मैं क्या करू....
कुंजी तो तुम्हारे पास है।।

एक सैलाब सा उमड़ रहा है
दरिया का तट बस डूबने को है
न जाने क्या बह जाएगा
क्या रहेगा शेष
मैं क्या करूँ????
जिन हिमखंडों को तुम तपिश दे गए
उनका मैं क्या करूँ
बंधन तो तुम्हारे पास है।।

जो द्वार तुम खोल गए।।।।

अर्थ


कहते हैं कि
हर चीज़ का कोई मतलब होता है
मेरे होने का भी, मेरे न होने का भी
कुछ भी अनर्थ नहीं होता
कुछ भी व्यर्थ नहीं होता
उसके होने का भी, न होने का भी
यह सच है..
हर चीज़ का कोई मतलब होता है
पर कभी-कभी
उस मतलब को जीना मुश्किल होता है
होने, न होने के क्षणों से गुजरना
मर्मान्तक होता है।।।।।

Wednesday, December 24, 2014

कैद

कैद, केवल चारदीवारी के अंदर बंद होना नहीं होता...
चारदीवारी का ढ़ह जाना भी कैद होता है...
एक निर्वात कैद।।।।

Sunday, June 8, 2014

जिंदगी

जिंदगी नाराज हो सकती है, निष्ठूर नहीं
जिंदगी देर हो सकती है, चुकती नहीं
जिंदगी आती है
पर कभी सीधे रास्ते नहीं आती
उस राह नहीं आती
जिस राह हम टकटकी लगाए होते हैं
पर जिंदगी आती है

जिंदगी आती है
टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों से
जिंदगी आती है
पिछवाड़े से
और थपथपा कर हमें चौंका देती है
पर जिंदगी आती है
जरुर आती है

जिंदगी आती है
रात के सन्नाटे में
बिना दस्तक दिए
नींद के आगोश से झकझोर हमें डराती है
पर गले भी लगाती है
जिंदगी आती है

जरुर आती है...................।

क्या फर्क पड़ता है....

क्या फर्क पड़ता है
लोगों के तरकश से
मेरे लिए कितने भी तीर निकलें
क्या फर्क पड़ता है इनसे
जब मैं निहत्थी खड़ी हूं
अपनी ही अंतरात्मा के सामने 
अपने ही प्रश्नों का बौछार झेलती
इनकी चुभन से कहीं भी ज्यादा नहीं है
उनके वाणों की चुभन
फिर क्या फर्क पड़ता है
लोगों के तरकश से कितने भी तीर निकलें

जब मैं निहत्थी खड़ी हूं
अपनी ही अंतरात्मा के सामने
सबसे उदासीन
एक बेचैनी से घिरी
स्वयं की तलाश में
....जिंदगी से लबरेज स्वयं
एक अर्थ में लिपटी जिंदगी....
फिर क्या फर्क पड़ता है
लोगों के तरकश से कितने भी तीर निकलें

बस एक क्षीण सी आशंका है
कहीं अपनी ईमानदारी से चुक न जाऊं
कहीं दुनियावी भटकनों में गुम न जाऊं
पर इस उदास सी बेचैनी में बहुत शक्ति है
इन आशंकाओं को निर्मूल करने में
वैसे तो यह बेचैनी बहुत दर्द देती है
पर यह निष्कलंक है, अनमोल है
इस बेचैनी के लिए तुम्हें शुक्रिया
फिर क्या फर्क पड़ता है
लोगों के तरकश से कितने भी तीर निकलें........................।