बंधन में मत बाँधो...
मुझे उड़ने दो।।
तुम्हारा बंधन बहुत ही प्यारा है
मेरी भी आँखों का तारा है
पर मेरा जीवन पथ है कुछ और
उसमे रमने दो।।
बंधन में मत बाधो, मुझे उड़ने दो।।
किसी टहनी पर बसेरा था
उम्मीदों का घेरा था
उसके आने की आस थी
हर आहाट में बसी साँस थी
पर जो निकला वो आंधी था
तिनकों को बिखेर गया, बिनने दो।।
बंधन में मत बाँधो, मुझे उड़ने दो।।
मेरे अंदर कुछ चटक गया है
अपने वजूद का कोई टुकड़ा छिटक गया है
कुछ अपना सा बिछड़ गया है
मेरा स्व अब अधूरा लगता है
उस आधे को ढूंढ़ने दो।।
बंधन में मत बंधो, मुझे उड़ने दो।।
एक मुट्ठी जमीन थी, एक मुट्ठी था आसमान
यही था मेरा वितान
बस इस पात से उस पात डेरा था
पर तक़दीर की रेखाओं के लिए
तंग यह घेरा था
बहुत कुछ अनदेखा बुला रहा है
इन्द्रियों से भी परे कोई रहस्य, रीझा रहा है
इस अज्ञात के आकर्षण को, आलिंगन में भरने दो।।
बंधन में मत बांधो, मुझे उड़ने दो।।
कौन जाने कोई पूर्णता वहां, टकटकी लगाये हो
मेरे वजूद का टुकड़ा, उसकी पैरहन ओढ़े बैठा हो
कौन जाने वो वहीँ को हो निकल पड़ा
मत रोको , मुझे उस राह को चलने दो
जो है शायद, जीवन पथ मेरा।।
बंधन में मत बांधो, मुझे उड़ने दो।।
माना कि वो बंधन बहुत ही प्यारा है
मेरी भी आँखों का तारा है
पर मेरा जीवन पथ है कुछ और
उसमेँ रमने दो।।
बंधन में मत बांधो, मुझे उड़ने दो।।
Monday, January 5, 2015
मुझे उड़ने दो..।
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