Saturday, January 24, 2015

रास्तों की दरकार है...

मंजिलों की आस अब कहाँ
बस रास्ते मिलते जाएँ
कि मिलता रहे साथ
सांसों की रफ़्तार को
समय के रेत-कण से भरी मुट्ठी
खाली न हो एक ही जगह
मिलता रहे उसे अवसर
आड़ी-तिरछी लकीरें खींचने को

मंजिलों की तलाश अब कहाँ
बस रास्तों की दरकार है
कि सफ़र का कारवां चलता रहे
भोर का सूरज शर्मिंदा न हो
दीवार पर टंगी कैलेंडर बेमानी न लगे
क्योँकि,
जिसकी आस थी, तलाश थी
वह तो मेरा भ्रम था
उस एक भ्रम में
रेत को पानी समझ पीछा किया
उस भ्रम की कसक अभी भी है
उस की तड़प अब भी है
पर कोई आस नहीं,
कोई तलाश नहीं..।

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